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लोकरंग

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प्रोफेसर यशपाल-एक बेखौफ और तर्कपूर्ण आवाज़

  • Nov 26, 2017

वे जानते हैं कि हमारी स्कूली-व्यवस्था बाल-मन के अनुकूल नहीं है। स्कूल परिसरों को हमने नीरस बना रखा है। पढ़ाने की हमारी पद्धतियां बच्चों में सीखने की ललक पैदा नहीं कर पा रही। स्कूल-प्रबंधन ना-ना कागज़ी कार्रवाइयों में उलझा रहता है। पढ़ाने की बजाय शिक्षक विविध रजिस्टरों को भरने में व्यस्त रहता है। पढ़ाने के लिए उसके पास न समय बचता है न दिलचस्पी।

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कलाओं पर लग गया जी एस टी..

  • Nov 26, 2017

अब नृत्य , नाटक , संगीत याने सभी प्रदर्शनकारी कलाएँ जी एस टी की जद में हैं । एक समय था जब नाटक या संगीत आदि कलाओं के कार्यक्रमों पर 25 प्रतिशत मनोरंजन कर लगता था।

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