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प्रतिबंधों में प्रतिरोध

एक सवाल और अठारह घंटे की हवालात। राजनीति के इस प्रश्र का गणित तो है। मगर इसका गणित से कोई वास्ता नहीं है। गणित की तरह राजनीति में दौ और चार नहीं होते। दो जमा दो, दो भी रह सकते हैं।


एक सवाल और अठारह घंटे की हवालात। राजनीति के इस प्रश्र का गणित तो है। मगर इसका गणित से कोई वास्ता नहीं है। गणित की तरह राजनीति में दौ और चार नहीं होते। दो जमा दो, दो भी रह सकते हैं। दो जमा दो मिलकर एक ही रह जाने की संभावना भी होती है और जोड़ सही हो जाये तो दो जमा दो पांच भी हो सकते हैं। मगर अठारह घंटे की हवालात बताती है कि जनतंत्र में तंत्र कितना हावी हो गया है। जन कैसे हाशिये पर पहुंच गया है।


यह घटना 21 सितंबर की है। नीमच में प्रभारी मंत्री अर्चना चिटनीस, सांसद सुधीर गुप्ता के साथ ही जिले के विधायकों के साथ सरकार के आयोजन में हो रहे भाजपा सम्मेलन में एक प्रश्र एक किसान कुचड़ौद गांव के निवासी मोहनलाल धानुका ने पूछा था। प्रश्र विधायक से था। विधायक दिलीप सिंह परिहार मंच से भाषण दे रहे थे। वे बार बार क्षेत्र जाने किसानों से मिलने और उनकी समस्याओं के समाधान के दावे कर रहे थे। जैसे ही उन्होने कचड़ौद गांव के दौरे की बात की। किसान ने इतना भर पूछ लिया कि वे उनके गांव कब गए थे?


जनतंत्र जवाबदेह शासन है। विधायक जी यदि गांव गए होते तो बता सकते थे कि किस दिन वे गए थे, किन किन किसानों और ग्रामवासियों से मिले थे, कौन कौन सी समस्या का समाधान किया था। मगर यह पूछना भी किसान को महंगा पड़ गया। उन्हें दोपहर में दो बजे पकड़ कर पुलिस थाने में बिठा दिया गया और अगले दिन सुबह आठ बजे जब उनके गांव से किसान पहुंचे तब जाकर उसे रिहा किया गया। वे कह सकते हैं कि मोहनलाल कार्यक्रम में खलल डाल रहा था। मगर एक और किसान भी था। जावद के इस किसान ने भी प्रधानमंत्री फसल बीमा को लेकर विधायक जी से प्रश्र किया था। उन्हें भी बीच सभा से उठा लिया गया। हवालात पहुंचा दिया गया। संयोग से उनकी पहचान के एक पुलिस वाले ने उन्हें दो घंटे बाद ही रिहा कर दिया।


प्रश्र यह है कि इन किसानों के प्रश्र क्या थे? मोहन लाल ने पूछा था कि गांव कब गए? हमारी फसले बर्बाद हो गई हैं। सरकार ने बीमा करवाये हैं। मगर बीमा कंपनी कौन है? मुआवजा किससे मांगे? जब यह सवाल करना भी अपराध है तो फिर इन आयोजनों के अर्थ क्या हैं और विधायक गांव गांव जाकर कौन सी समस्या का समाधान करते हैं? इससे जुड़ा हुआ दूसरा प्रश्र यह है कि किसी भी व्यक्ति को बिना रिपोर्ट अठारह घंटे तक हवालात में रखना अपराध है। मगर प्रशासन ने यह किया है। और यदि प्रशासन इस हद तक जनता के जनवादी अधिकारों का हनन करता है तो यह अचानक नहीं बल्कि सरकार के इशारे पर हो रहा है।


जनतंत्र में तंत्र जन से डरा हुआ है। सहमा हुआ है। इसलिए प्रश्र पूछते ही पहले एसडीएम आकर मोहन लाल को धमकाते हैं। फिर सिविल ड्रेस में दो पुलिस वाले उसे उठाकर ले जाते हैं और कैंट थाने पहुंचा देते हैं। फिर जावद का किसान प्रश्र करता है तो उसे भी सादा कपड़ों में दो पुलिस वाले आते हैं, उसे उठाकर ले जाते हैं और पुलिस थाने छोड़ देते हैं। अब तय करना मुश्किल है कि उस आयोजन में कितने पुलिस वाले थे और कितनी जनता। आपातकाल में इंदिरा गांधी और संजय गांधी की सभाओं की भीड़ में ऐसे ही सादा वर्दी में पुलिस को बिठा कर जनता के साथ होने का भ्रम पाला जाता था। अब भाजपा भी यही कर रही है। मगर आपातकाल के बाद का परिणाम भाजपा को याद रखाना चाहिये।


नीमच में जो हुआ, उसे एक घटना के रूप में देखना ठीक नहीं है। यह प्रवृत्ति है। यह जनतंत्र पर हमला है, जो लगातार हो रहा है। यह वही हमला हो जो रक्षाबंधन के दिन चिखलदा में हुआ था। महिलाओं पर लाठियां चलाई गई थी और तेरह दिन की भूखी मेधा पाटकर को उठाकर गिरफतार कर लिया गया। तेरह दिन की भूखी मेधा पाटकर पर अधिकारियों को बंधक बनाने के आरोप लगाकर उन्हें जेल में डाल दिया गया। आनंद मोहन माथुर जैसे वकील की तीन दिन तक जिरह करने के बाद ही उन्हें 17 दिन बाद जेल से रिहाई मिली। नर्मदा घाटी के डूब क्षेत्र में उनका प्रवेश एक साल के लिए प्रतिबंधित करने का आदेश निकाल दिया गया। यह भी जनतंत्र पर हमला है।


मंदसौर में यह यह बार बार दोहराया जा रहा है। पहले फसल का वािजब दाम मांगते छ: किसानों को गोलियों से भून दिया गया। फिर लोगों के जनतांत्रिक अधिकारों को कुचला गया और 15 सितंबर को जब किसानों ने अपने शहीदों की प्रतिमायें लगाने का निर्णय किया गया तो अनुमति देने से इंकार कर दिया गया।


बात अलग है कि सरकार की साजिशों के बाद भी हजारों किसान इस कार्यक्रम में शामिल हुए। मगर प्रदेश में जनतंत्र पर हमले जारी है। आमसभाओं के लिए मान्य सभी सार्वजनिक स्थल प्रतिबंधित हैं। धारा 144 लागू और रासुका में किसी को भी बंद करने के निर्देश कलैक्टरों के दे दिये गए हैं।


मगर शासक भूल जाते हैं कि प्रतिबंधों में ही प्रतिरोध के ज्वाला फूटते हैं। खुद को सुरक्षित समझने वाले शासक असंतोष की सुरंग के मुहाने पर बैठे हैं।

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