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संघर्षों से निकलेगा विकल्प

पिछले चौदह साल से प्रदेश की सत्ता पर भाजपा काबिज है। इन चौदह सालों में प्रदेश को नोंच नोंच कर लूटा गया है। यह सही है कि इस लूट में भाजपा और संघ परिवार ही पूरी तरह से शामिल है। मगर प्रदेश की मुख्य...


पिछले चौदह साल से प्रदेश की सत्ता पर भाजपा काबिज है। इन चौदह सालों में प्रदेश को नोंच नोंच कर लूटा गया है। यह सही है कि इस लूट में भाजपा और संघ परिवार ही पूरी तरह से शामिल है। मगर प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस भी इस लूट में शामिल है। मध्य प्रदेश में कांग्रेस और भाजपा की समानताओं का जिक्र करते हुए बहुत पहले तबके कांग्रेसी मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने कहा था कि जहां सरकारें बदलने की बाद भी लूटने वाले हाथ नहीं बदलते हैं, क्योंकि छोटा भाई अगर भाजपा में है तो बड़ा कांग्रेस में है।


पिछले विधान सभा चुनावों से पहले कांग्रेस विधायक दल के नेता अजय सिंह उर्फ राहुल भैया ने भी इसे अलग तरह से स्वीकारा था। विधान सभा के अंदर कांग्रेस की सशक्त भूमिका पर उठे प्रश्नों का जवाब देते हुए उन्होने अपनी दुविधा बताई थी कि यदि हम किसी भी जिले में रेत खनन या भ्रष्टाचार का कोई मामला उठाते हैं तो उस जिले के कांग्रेस वालों के ही फोन आने शुरू हो जाते हैं कि इस मामले में तो हम भी शामिल हैं।


पिछले चौदह साल का प्रदेश का कोई बड़ा से बड़ा घोटाला उठा कर देख लीजिए। यह व्यापमं भी हो सकता है। इसमें दो राय नहीं है कि इस भ्रष्टाचार के सूत्र मुख्यमंत्री निवास से जुड़ते हैं। संघ के सरसंघचालक सुदर्शन तक का नाम इसमें शामिल है। मगर इसके बाद भी क्या इस मामले में कांग्रेसियों से पूछ ताछ नहीं हुई है? फिर कटनी का हवाला कांड। जब कटनी की जनता इस कांड को उजागर करने वाले पुलिस अधीक्षक का विरोध कर रही थी, तब क्या कांग्रेस का ही एक हिस्सा मामले के आरोपी संजय पाठक को बचाने में नहीं लगा हुआ था? चर्चा तो यह भी है कि कांग्रेस के कुछ नेता उसे कांग्रेस में लाने की कोशिश कर रहे हैं।


बावजूद इसके कि पिछले चौदह साल में भाजपाई मालामाल हुए हैं। प्रदेश की 80 प्रतिशत बसें भाजाईयों की है। रेत के 90 प्रतिशत ठेके भाजपा वालों के हैं। व्यापमं ने पूरी पीढ़ी को बर्बाद किया है। 80 प्रतिशत खनन माफिया भाजपा के नेता हैं या भाजपा से जुड़े हुए हैं। सुधीर शर्मा जैसे खननमाफिया का धंधा अगर मुख्यमंत्री से जुड़ता है तो उसके संबंध राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से भी जुड़ते हैं।


नव उदारीकरण की नीतियों को दोनों ही लागू करते हैं। बिजली के निजीकरण की शुरूआत कांग्रेस ने की। भाजपा ने इसे पूरा किया। रोडवेज को बंद करने की शुरूआत कांग्रेस ने की। भाजपा ने इसे खतम किया। शिक्षा और स्वास्थ्य के निजीकरण में भी दोनों भागीदार हैं। इसलिए शिक्षण संस्थानों और निजी नर्सिंग होम्स भी भाजपा और कांग्रेस वालों के ही कब्जे में हैं। इसलिए इस लूट के खिलाफ कांग्रेस उतना ही बोलती है, जितना बोलने से उसका हिस्सा सुरक्षित हो जाये।


प्रदेश सामाजिक उत्पीडऩ में सबसे आगे हैं। दलित, महिला आदिवासी सब सामंती उत्पीडऩ का शिकार हो रहे हैं।


हां भाजपा और संघ परिवार की लूट के अलावा खतरनाक राजनीति है। संघ परिवार का इस देश के संघीय ढांचे में केाई विश्वास नहीं है। उनकी देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे में भी कोई आस्था नहीं है। उनका जनतंत्र मे भी विश्वास नहीं है। संघ हिन्दुत्व की फासीवादी विचारधारा से संचालित होता है। हिन्दुराष्ट्र की स्थापना उनका लक्ष्य है। अपने इस एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए वे समाज का साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करते हैं। इसके लिए भाजपा सरकार कभी पाठ्यक्रमों में बदलाव लाकर उसका साम्प्रदायीकरण करती है। कभी गीता को अनिवार्य करती है। कभी मदरसों का अनुदान रोकती है। कभी गौरक्षा के नाम पर गुंडागर्दी को प्रोत्साहन देती है।


अल्पसंख्यक समुदायों में आतंक और भय का वातवरण तैयार करती है। विचाराधीन कैदियों को हत्या कर एनकांउटर बताती है। भाजपा अपने साम्प्रदायिक एजेंडे को तेजी से लागू कर रही है, मगर कांग्रेस इसके खिलाफ बोलने तक को तैयार नहीं है।


    यही वजह है कि सिर्फ भाजपा को सत्ता से हटाया जाना काफी नहीं है। प्रदेश को बर्बाद करने वाली भाजपा की नीतियों का विकल्प भी जनता के सामने पेश करना होगा।  यह विकल्प कोई बौद्विक विचार विमर्श का विषय नहीं है, बल्कि यह विकल्प जनता के अपने अनुभवों से सामने आयेगा। यह अनुभव संघर्षों से जन्म लेगा।  इसलिए यह विकल्प केवल वामपंथी धर्मनिरपेक्ष दल और वो सामाजिक व जन संगठन ही दे सकते हैं, जिनका कोई सामाजिक सरोकार हो, जो इस समय संघर्षों के मोर्चे पर जनता के साथ डट कर खड़े हैं। लड़े हैं और लड़ रहे हैं।


12 अगस्त को वामपंथी और धर्मपिरपेक्ष दलों, सामाजिक और जन संगठनों तथा विभिन्न मोर्चों पर कार्यरत जनवादी वामपंथी सोच वाले कार्यकर्ताओं का प्रदेशव्यापी संयुक्त सम्मेलन आशा की एक नई किरण पैदा करता है। भाजपा और कांग्रेस जितने भी दावे करें कि प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस दो ही दल हैं, मगर हर चुनाव में एक तिहाई मत भाजपा और कांग्रेस के खिलाफ पड़े हैं। वर्तमान परिस्थितियों में जब जनता भाजपा से नाराज है तो जाहिर है उसका एक हिस्सा भाजपा से दूर होगा। जब भाजपा कांग्रेस को तोड़ कर कांग्रेसमुक्त करने की बात करता है तो कांग्रेस का धर्मनिरपेक्ष तबका भी भाजपा की बजाय दूसरे विकल्प की तलाश करेगा।


12 अगस्त का सम्मेलन इस प्रकार की जनभावनाओं की धुरी हो सकता है। बस जरूरत इस बात की है कि आने वाले दिनों में संयुक्त सम्मेलन के प्रस्ताव को लेकर प्रदेश के कोने कोने में अभियान चलाया जाये। एक वामपंथी जनवादी और धर्मनिरपेक्ष विकल्प जनता के सामने पेश किया जाये।

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