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प्रोफेसर यशपाल-एक बेखौफ और तर्कपूर्ण आवाज़

वे जानते हैं कि हमारी स्कूली-व्यवस्था बाल-मन के अनुकूल नहीं है। स्कूल परिसरों को हमने नीरस बना रखा है। पढ़ाने की हमारी पद्धतियां बच्चों में सीखने की ललक पैदा नहीं कर पा रही। स्कूल-प्रबंधन ना-ना कागज़ी कार्रवाइयों में उलझा रहता है। पढ़ाने की बजाय शिक्षक विविध रजिस्टरों को भरने में व्यस्त रहता है। पढ़ाने के लिए उसके पास न समय बचता है न दिलचस्पी।


मनोज कुलकर्णी@आहट

प्राथमिक विद्यालय के दिनों की एक बात आज तक याद है। हमें छुट्टी की घंटी की आवाज़ सबसे सुखद मालूम देती थी। उसके बजते ही होहोहोहो का समवेत स्वर करते हुए सारे बच्चे छूट भागते थे। वह खुषी कुछ यूं हुआ करती मानो किसी जेल से मुक्ति मिल गयी हो। चार दशक बीत चुके, मगर वह स्थिति आज भी कमोबेश वैसी ही है। स्कूल से छूटते ही बच्चे राहत महसूस करते हैं। यह भी सच है कि स्कूल जाने के लिए भी कई बच्चे आनाकानी करते हैं। रोते हैं। ये हालात शिक्षाविदों की परेशानी का सबब हैं। वे जानते हैं कि हमारी स्कूली-व्यवस्था बाल-मन के अनुकूल नहीं है। स्कूल परिसरों को हमने नीरस बना रखा है। पढ़ाने की हमारी पद्धतियां बच्चों में सीखने की ललक पैदा नहीं कर पा रही। स्कूल-प्रबंधन ना-ना कागज़ी कार्रवाइयों में उलझा रहता है। पढ़ाने की बजाय शिक्षक विविध रजिस्टरों को भरने में व्यस्त रहता है। पढ़ाने के लिए उसके पास न समय बचता है न दिलचस्पी।


इन्हीं चिंताओं के मद्देनजऱ भारत सरकार के शिक्षा-मंत्रालय ने 1992 में एक राष्ट्रीय सलाहकार समिति स्थापित की थी। विख्यात वैज्ञानिक और शिक्षा-शास्त्री प्रोफेसर यशपाल जिसके अध्यक्ष थे। इस कारण उसे ‘यशपाल समिति’ ही कहा जाता है। इस समिति की रिपोर्ट का शीर्षक है - ‘लर्निंग विदाउट बर्डन’। यानी ‘बोझ मुक्त शिक्षा’। यह बोझ न केवल पाठ्यपुस्तकों से लदे-फदे बस्तों का है, जो छात्रों के कंधे झुका देता है, बल्कि बोझिल पाठ्यक्रम, प्रतियोगिता के दबाव, परिक्षाओं के डर और पढ़ाने की उबाऊ पद्वतियों का भी है। यह बच्चों की वास्तविक जिज्ञासाओं को तार्किक तरीके से हल करने की बजाय उनके दिमागों में जानकारियां ठूस देने की तंत्र की जि़द का बोझ है। प्रोफेसर यशपाल बच्चों को इन तमाम बोझों से मुक्त कर देने के पक्षधर थे।  


वैज्ञानिक दृष्टि संपन्न, बच्चों के मनोविज्ञान को समझने वाले और ‘सीखने के मजे’ की पैरवी करने वाले वही प्रोफेसर यशपाल अब हमारे बीच नहीं है। इसी 24 जुलाई को दिल्ली से सटे नोयडा में उनका निधन हो गया। कॉस्मिक-किरणों के अध्येता रहे यशपाल आला दर्जे के वैज्ञानिक तो थे ही। 1958 में अमेंरिका के मैसाचुसेट्स प्रोद्यागिकी संस्थान से डॉक्टर की उपाधि हासिल करने बाद वे विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर रहें। वे टाटा बुनियादी शोध संस्थान में प्रोफेसर रहें, योजना आयोग के विशेष सलाहकार रहें, विज्ञान और प्रोद्योगिकी विभाग के सचिव रहे। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के चेयरमेन रहे। आजकल के सत्ता-तंत्र और उनके लघुओं-भगुओं के हमले झेल रहे देश की सर्वोत्तम शिक्षा-संस्थानों में से एक ‘जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय’ नईदिल्ली के कुलपति भी। मगर, पदों पर रहना भर उनकी उपलब्घि न थी। वे पदों की गरिमा को ढोते रहने वाले शख्स भर नहीं रहें। पद या प्रतिष्ठा चाहे जितनी रही, उनके पांव ज़मीन पर रहे।   

    
प्रोफेसर यशपाल की एक खासियत यह भी रही कि वे सही अर्थों में ‘जनविज्ञानी’ थे। जनविज्ञान के आंदोलनों और शिक्षा को औपचारिकता की हदबंदी से मुक्त कराने की कोशिशों के साथ वे खुल कर खड़े रहे। उनकी सहजता दिखावटी नहीं थी। व्यवस्था में ऊपरी पायदानों पर होने और मान-सम्मान पाने के बावजूद उनकी दोस्ती दूरदराज़ के संगठनों और संस्थाओं के साथ उम्र के आखरी पड़ाव तक चली आई। दूरदर्शन के स्वर्णिम दिनों में प्रसारित होने वाला कार्यक्रम ‘टर्निंग-पाइंट’ जिस किसी के जेहन में होगा, इस बात से इत्तफाक रखेगा। विज्ञान के जटिल सवालों के जवाब में यशपाल अपने ‘ज्ञान’ का पिटारा खोल कर बैठ नहीं जाते थे। दर्शकों को शामिल करने की गजब कूबत उनमें थी, लिहाजा अमूमन शुष्क माने जाने वाले विज्ञान में भी वे रस पैदा कर देते थे। जाहिर है आम लोगों की दिलचस्पी भी उस कार्यक्रम में खूब थी।


आज देश एक मुश्किल दौर में है। केंद्र और अनेक सूबों में ऐसी राजनीतिक ताकत सत्ता में आ चुकी है, जिसका धर्मनिरपेक्ष जनतंत्र और वैज्ञानिक सोच में रत्ती भर भरोसा नहीं है। वह देश को बाबा आदम के ज़माने में लिए जाने को कटीबद्ध उपद्रवी-समूहों की जमात है। जो हिंसक तरीकों से अवैज्ञानिक सोच और रुढ़ीवाद को ‘भारतीयता’ का पर्याय बना देने की फिराक में है। जो इतिहास के तथ्यों को तोडऩे-मरोडऩे और शिक्षा-व्यवस्था को कूड़ादान बनाने की परियोजना में व्यस्त है। बेसिरपैर की अवधारणाएं विज्ञान बताई जाने लगी हैं। ऐसे में प्रोफेसर यशपाल का निधन एक तार्किक और बेखौफ आवाज़ का चले जाना है।
सलाम प्रोफेसर यशपाल !

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